Mirgi Ka Ilaj

Mirgi Ka Ilaj

मिर्गी का इलाज

मिरगी, अपस्मार
(epilepsy)

Mirgi Ka Ilaj, Epilepsy Treatment, Epilepsy Causes

अचानक चेतना शून्य होकर, जमीन पर गिर पड़ना, हाथ-पैर कड़े हो जाना, अस्पष्ट भाषा में कुछ बोलने का प्रयास करना, आँखों की पुतलियाँ ऊपर की ओर चली जाना आदि लक्षण होने पर मिरगी का सन्देह करें। इसमें मल-मूत्र अनजाने में निकल जाता है। होश में आने पर ऐसा लगता है कि उसे कुछ ज्ञान ही नहीं है कि उसके साथ क्या घटना घटी है। वह अज्ञान-सा, उपस्थित लोगों का मुँह देखता रहता है। दौरा के समय मुँह से झाग आता है।

अन्य परिचय-

अपस्मार का अर्थ ‘अप+स्मार’। ‘अप’ का अर्थ “नष्ट“ के रूप में लिया जाता है जैसे- अपयश, यक्ष का नष्ट होना और स्मार का अर्थ “स्मृति“। इस प्रकार अपस्मार का अर्थ ‘स्मृति’ का नष्ट होना है। वस्तुतः मिर्गी(अपस्मार) एक ऐसा रोग है, जिसमें स्मृति का ह्यस होता और रोगी ज्ञानहीन हो जाता है। वह कहाँ है और किस रूप में है, यह भी उसे ज्ञान नहीं होता है।

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मुख्य लक्षण-

Mirgi Ka Ilaj

1. दौरे की अवधि में रोगी अपने को अंधेरे में जाता देखता है।

2. उसकी स्मृति(याददाश्त) नष्ट हो जाती है।

3. पलक उठाकर देखने से दोनों आँखों की पुलतियाँ ऊपर की ओर होता है और सामने सफेद होता है।

4. रोगी हाथ-पैर इधर-उधर मारता या अकड़न पूरे शरीर में हो जाती है। माँसपेशियाँ कठोर हो जाती हैं।

5. मुँह से झाग निकलती और अव्यक्त, अस्पष्ट गों..गों.. जैसी या इससे मिलती-जुलती आवाज़ निकलती है। ऐसा जान पड़ता है कि रोगी कुछ बोलना चाहता है। ये सारे लक्षण कुछ सैकेण्ड से कुछ मिनटों तक देखे जा सकते हैं।

6. दौरा पड़ने की अवधि में दांत बैठना या घिसना, अज्ञानावस्था में मल-मूत्र निकल जाना, शरीर का रंग मलीन हो जाना आदि लक्षण भी होते हैं।

7. दौरा समाप्त होने पर रोगी धीरे-धीरे होश में आने लगता है, लेकिन शरीर शिथिल हो जाता है और रोगी सोना चाहता है। जो मिर्गी का रोगी होता है, वह नींद से जल्दी नहीं उठता है।

8. रोगी की जीभ पीली होती है, परन्तु नीचे की रंगे नीली।

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9. दिल बराबर अज्ञात कारण के उदास रहता है। संभवतः इस उदासी का मुख्य कारण रोग संबंधी चिंता होती है।

10. थोड़ा भी क्रोध आते ही सिर में भारीपन प्रतीत होता है।

11. लगातार बुरे स्वप्न देखता है।

12. स्मरणशक्ति कमज़ोर हो जाती है।

13. रोगी हर चीज से अनावश्यक भयभीत होता है।

14. बुरे-बुरे विचार मस्तिष्क में आते हैं।

15. सामान्य कारणों से भी क्रोध आता है।
उपरोक्त लक्षण मिर्गी के रोगियों में देखे जाते हैं, जिसके आधार पर बिना दौरे की स्थिति में भी मिर्गी के रोगी को पहचाना जा सकता है।

मिर्गी के प्रकार-

दोषानुसार मिर्गी के 4 प्रकार हैं- 1. वातज, 2. पित्तज, 3. कफज, 4. त्रिदोषज।
वातज मिर्गी- दौरे के समय में कम्पन्न होना, दाँत पीसना, मुँह से झाग आना, रोगी को चारों ओर लाल ही लाल दिखाई दे, तो इसे वातज मिर्गी समझें।

पित्तज मिर्गी- नेत्र पीले या पीले आभायुक्त, प्यास लगे, सभी पदार्थ आग से घिरे दिखाई देते हैं, तो इसे पित्तज मिर्गी समझें।

कफज मिर्गी- चेहरे का रंग, मुँह से निकली झाग का रंग और नेत्रों का रंग सफेद हों, दौरे के समय, रोेंयें खड़े हों, सभी पदार्थ सफेद दिखाई दें, होश काफी देर से आये तो इसे कफज मिर्गी समझें।

सन्निपातज मिर्गी- इस रोग से ग्रस्त रोगी में उपरोक्त तीनों लक्षण पाये जाते हैं।
मिर्गी के अतिरिक्त दौरा पड़ने जैसा एक और रोग है, जिसे हम योषापस्मार और हिस्टीरिया कहते हैं।

देसी उपचार-

Mirgi Ka Ilaj

1. अरीठे को कूट-छान लें। इसकी नस्य प्रतिदिन लेने से मिर्गी ठीक हो जाती है।

2. मिरगी का दौरा पड़ने पर कड़वी तोरी पानी में पीसकर 2-3 बूँद नाक में टपकायें, होश आ जायेगा।

3. कलौंजी 20 ग्राम, नौशादर 10 ग्राम, एलवा 6 ग्राम अच्छी प्रकार पीसकर तिलों के तेल में मिला लें। दौरा पड़ने पर 2-3 बूँद नाक मेें डालें, लाभ होगा।

4. छोटी कटाई का रस की 2-3 बूँदें दौरा के समय नाक में डालें। रोगी जल्दी होश में आ जायेगा।

5. जदवार 60 मि.ग्रा. प्रतिदिन दें।

6. अकरकरा का चूर्ण 3 ग्राम दिन में 1 बार शहद में मिलाकर चटायें।

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7. बच का चूर्ण 2 से 3 ग्राम शहद में मिलाकर प्रत्येक दो बार चटायें।

8. अजवाइन और काफूर- प्रत्येक 125 मि.ग्रा. सुहागे की खील(लावा) 500 मि.ग्रा. में मिलाकर प्रतिदिन 3 बार काफी समय तक सेवन करायें।

9. दौरे के समय राई(रैंची) पीसकर किसी पतले कपड़े से पोटली में बांधकर सुंघायें। रोगी शीघ्र होश मंे आ जायेगा।

10. दौरे के समय ढाक की जड़ पानी में घिसकर नाक में टपकाने से मिर्गी ठीक हो जाती है।

11. महुए की आधी गुठली और काली मिर्च 2.5 दाना पानी में पीसकर नाक में टपकाने से मिर्गी में लाभ होता है। इस योग से मिर्गी के दौरे के समय अच्छी सफलता मिलती है।

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