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Madhumeh Ka Natural Treatment Kya Hota Hai

मधुमेह का नेचुरल ट्रीटमेंट क्या होता है?

मधुमेह की प्राकृतिक चिकित्सा-

(Natural Diabetes Treatment)

प्राकृतिक चिकित्सा वह चिकित्सा पद्धति है, जिसमें औषधि का प्रयोग नहीं किया जाता है। खान-पान, रहन-सहन के तरीके में सुधार लाकर रोगी को रोगमुक्त किया जाता है। इसमें मिट्टी, पानी, वायु, सूर्य की किरणें, मालिश, सेंक, एनिमा आदि के द्वारा रोग को दूर किया जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा के अन्तर्गत मधुमेह रोग के दूर करने के लिए रोगी को प्रतिदिन सुबह-शाम डेढ़-डेढ़ घंटे तक टहलने के लिए कहा जाता है, ताकि शरीर के अंगों का आवश्यक व्यायाम हो सके और कैलोरी जल सके। प्रति घंटा टहलने में गति के अनुसार 150-300 तक कैलोरी खर्च होती है।

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चूँकि यह पाचन प्रणाली का रोग है, अतः पाचन प्रणाली को सुधारने के लिए रोगी को कटि स्नान कराया जाता है। कटि स्नान से यकृत, प्लीहा, अग्नाशय, आमाशय के रस का स्राव बढ़ता है और पेट अच्छी प्रकार से साफ हो जाता है। कटि स्नान के लिए टब में पानी भरकर उसमें इस प्रकार बैठाया जाता है कि जाँघों से लेकर नाभि तक भाग पानी में डूबा रहता है। पैरों को टब के बाहर रखी हुई तिपाई(चैकी) पर रखा जाता है तथा टब के तकियादार सिरे से पीठ के बल टिक कर बैठाया जाता है। सुबह-शाम यह स्नान 10-15 मिनट तक टहलने से पहले कराया जाता है।

रोगी को भोजन में गाय के दूध का दही, चोकर समेत आटे की रोटी, करेला, परवल, तोरी, टिण्डा, लौकी आदि की सब्जी बिना नमक, मसाले तथा तेल के दी जाती है। रोगी को नित्य कुछ खट्टे फल, टमाटर, संतरा, मौसम्बी, अन्नानास, मकोय, जामुन, सेब(खट्टे) आदि सेवन करवाये जाते हैं, ताकि रक्त में अम्लता न बढ़े।

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मयूरासन, मत्स्यासन, धनुरासन, मत्स्येन्द्रासन, सर्वांगासन आदि आसनों को रोगी को प्रतिदिन कराया जाता है। इनसे इंसुलिन का स्राव बढ़ता है।

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आलू, चावल, चीनी, दालें, माँस, मछली, अण्डा, चाय, काॅफी, शराब, सिगरेट आदि का सेवन बंद करवा दिया जाता है तथा हरी सब्जी एवं सलाद पर्याप्त मात्रा में दिया जाता है। गाय के दूध का दही भी रोगी को प्रतिदिन दिया जाता है।

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रोगी को प्रतिदिन ठण्डे पानी से स्नान की सलाह दी जाती है तथा स्नान से पूर्व तौलिये से सम्पूर्ण शरीर रगड़ कर घर्षण स्नान करने को कहा जाता है, ताकि रोमछिद्र खुल जाये, जिससे पसीना बाहर निकले।

Madhumeh Ka Natural Treatment Kya Hota Hai

रोग के प्रारम्भ में 1-2 दिन का उपवास करवाया जाता है। उपवास के दौरान नींबू पानी दिया जाता है। उपवास के बाद एक सप्ताह तक केवल खट्टे फलों एवं तरकारी पर रहने की सलाह दी जाती है। इस दौरान सुबह नाश्ते में 250-300 ग्राम टमाटर, संतरा अथवा जामुन खाने को दिया जाता है। दोपहर एवं रात को 250-300 ग्राम की मात्रा में हरी उबली सब्जी दी जाती है तथा तीनों समय 250 ग्राम दही दिया जाता है। इसी प्रकार 1-2 सप्ताह बीतने के बाद दोपहर एवं रात्रि के भोजन में चोकर समेत गेहूं के आटे की 2-2 रोटियां(वज़न 50 ग्राम) भी दी जाती है।

रोगी को कब्ज़ रहने पर एनिमा कराया जाता है, ताकि पेट साफ रहे।

रोगी को प्रसन्न रहने को कहा जाता है। चिंता, शोक, क्रोध, मोह, तनाव आदि मानसिक रोगों से दूर रखा जाता है, क्योंकि इनका प्रभाव अग्नाशय रस के स्राव पर पड़ता है।

रोगी को अंकुरित अनाज- अंकुरित चना, अंकुरित गेहूँ, अंकुरित मूँग, अंकुरित मोठ का सेवन भी प्राकृतिक चिकित्सा में आहार के अन्तर्गत कराया जाता है तथा नित्य सुबह के समय नींबू पानी पीने को दिया जाता है।

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