Gathiya Rog Ki Ayurvedic Dawa

Gathiya Rog Ki Ayurvedic Dawa

गठिया रोग की आयुर्वेदिक दवा

आमवात, गठियावात, गठिया-बाय, संधिवात, माँसपेशियों का गठिया, जोड़ों की सूजन, आमवातिक ज्वर
(Rheumatism, Muscular Rheumatism, Gout, Rheumatic Fever)

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परिचय-

माँसपेशियों, संधियों या शरीर की अस्थियों पर जब इस रोग का आक्रमण होता है तो इसे आमवात संधिवात कहते हैं। इस रोग की उग्रता के साथ-साथ ज्वर भी होता है इसलिए इसे आमवातिक ज्वर भी कहते हैं। कई परिवारों में यह वंशगत रोग के रूप में होता है।

कारण-

रक्तदोष इसका मुख्य कारण है जिसके कारण कई परिवारों में यह वंशगत रोग के रूप में होता है। इसके अतिरिक्त ऋतु या जलवायु परिवर्तन, कब्ज़, पेट में गैस बनना, खेसरी की दाल का अधिक प्रयोग करना, खटाई का अधिक प्रयोग करना, सीलन वाले स्थान में रहना भी इस रोग के कारण हैं।

लक्षण-

इस रोग का होना अचानक प्रतीत होता है। ज्वर 101 से 104 तक हो जाता है। आक्रान्त संधियों में पीड़ायुक्त प्रदाह, जीभ पर मैल जम जाना, मूत्र का रंग बदल जाना, रक्ताभाव होना, पसीना अधिक आना, चलने से संधिपीड़ा में वृद्धि होना, 2-3 दिन के अंतराल पर नई-नई संधियों में पीड़ा का संक्रमण होना सामान्यतः घुटनों, कमर, एड़ी मणिबन्ध(कलाई) का आक्रान्त होना आदि लक्षण होते हैं।

रोग की पहचान-

संधियों में प्रदाहयुक्त पीड़ा के साथ-साथ सूजन एवं ज्वर का होना निर्देशक लक्षण हैं। यदि ‘सोडा सैलिसियास’ से लाभ हो तो अन्य रोग क संदेह न करके वात रोग ही समझें।

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प्राकृतिक चिकित्सा-

Gathiya Rog Ki Ayurvedic Dawa

1. मल निष्कासान शरीर के चार स्थानों मलद्वार, मूत्रद्वार, त्वचा रन्ध्र एवं नासिका से होता है। इन्हें पूर्णतः नियमित रखें जिससे ये अपने कार्य को अच्छे प्रकार से करने में सक्षम रहें। ऐसा करने से रक्त विकार मुक्त होगा और रोग की उग्रता कम होगी।

2. हमारा रक्तक्षार प्रधान है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए रक्त को क्षार प्रधान बनाये रखना ही हितकर है। अतः फल, सब्जियां, चोकर वाली रोटी जो क्षार प्रधान हैं, अतः इसका प्रयोग अनुकूल है।

3. अम्लकारक आहार छोटा चावल, चोकर सहित आटे की रोटी, सफेद चीनी, दालें, तली चीजें, माँस, अण्डा, मिर्च-मसाले, खटाई आदि की अधिकता वात रोगी के लिए हानिकारक है। भोजन में इनकी अधिकता से रक्त के क्षारीय गुण कम हो जाते हैं, जो रोग का कारण है।

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4. स्नान में ठंडे पानी का प्रयोग उत्तम है। जो रोगी अधिक कमजोर हों, गर्म पानी से स्नान करने के आदि हों, उनको ठंड के मौसम में थोड़ा गर्म पानी, ठंडे पानी में ही मिलाकर स्नान करना चाहिए।

5. त्वचा के रोमकूपों को खुला रखने के लिए त्वचा की सफाई तो आवश्यक है ही, पसीना आना भी आवश्यक है। इस सिद्धान्त से आयुर्वेद भी सेहमत है।

6. आहार में अम्लकारक आहार को बंद करके क्षारमय आहार दें।

7. क्षारमय आहार जैसे- सभी प्रकार के फल, संतरा, मौसमी, चकोतर, अनानास, रसभरी, सेब, नाशपाती आदि मुख्य हैं। सब्जियों में परमल, लौकी, तोरी, पत्ता गोभी, टमाटर, पत्तेदार सब्जियाँ लाभदायक हैं। सेब और नाशपाती को छिलका सहित खाना अधिक लाभदायक है। मसाले कम से कम खायें तो अच्छा है।

8. गठिया को कई श्रेणियों में बांटा जा सकता है जैसे-
1. जोड़ों में दर्द लगातार नहीं होता है।
2.जोड़ों में दर्द लगातार होता है।
3. जोड़ों का दर्द लगातार इतना तीव्र होता है कि बिस्तर से उठना कठिन हो जाता है, अतः जिन पर जितना ही अधिक रोग का कष्टदायक आक्रमण हो, उन्हें उतने ही अधिक समय तक फल तथा तरकारियां खानी चाहिए।

9. आरम्भ में सभी प्रकार के रोगियों को 4 दिन तक केवल फलों और तरकारियों का रस दें। रोगी पानी भी ले सकता है।

10. यदि पानी लेकर उपवास किया जाये तो उसके बाद 1-2 दिन फल और तरकारियाँ अवश्य लें। इसके बाद सुबह-शाम रस और दोपहर को कोई रसीला फल या पत्तीदार सब्जी लें।

11. तीसरे दिन सुबह, दोपहर और शाम को फल लें। फल एक बार में एक ही प्रकार का लें।

12. गठिया के रोगियों के लिए संतरा सबसे अधिक लाभदायक है। इसे अधिक से अधिक लेना चाहिए। ऐसे कई अन्य प्राकृतिक उपाय हैं, जिनसे इस रोग में आराम पाया जा सकता है।

घरेलू चिकित्सा-

Gathiya Rog Ki Ayurvedic Dawa

1. ताजे या गुनगुने पानी में(ऋतु अनुसार) नींबू निचोड़ कर 4-5 घण्टे के अंतर से दें। नये पुराने हर प्रकार की वात पीड़ा में लाभकारी है।

2. फालसे की जड़ का क्वाथ(काढ़ा) नित्स सुबह-शाम 50 से 100 मि.ली. दें।

3. सोंठ 25 ग्राम, हरड़ 100 ग्राम और अजमोदा 15 ग्राम पीसकर 5-5 ग्राम सुबह-शाम गुनगुने जल के साथ लें। आशातीत लाभ होगा।

4. उपलों की आग में 4-5 आलू भूनकर छिलका उतार कर नमक-मिर्च मिलाकर नित्य खाने से धीरे-धीरे गठिया ठीक हो जाता है।

5. करेले के रस में समभाग तिलों या सरसों का तेल मिलाकर आक्रान्त स्थान पर मालिश करने से पीड़ा दूर हो जाती है।

6. एरण्ड का तेल 5 से 10 मि.ली. गर्म दूध में मिलाकर नित्य रात को पियें।

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