Gale Ke Tonsils Ke Liye Ayurvedic Upay

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कंठमूल ग्रंथि शोथ, टाँसिल बढ़ना(Tonsillitis)

परिचय-

मुँह खोलने पर जीभ के पिछले भाग में ऊपर से एक प्रकार का मांसल पिंड लटकता हुआ दिखाई देता है। इसके बांयी और दांयी ओर 1-1 ग्रंथि होती है। इनको कंठमूल(ज्वदेपस) ग्रंथि कहते हैं। जब इसमें प्रदाह हो जाता है, तो इसे कंठमूल ग्रंथि प्रदाह कहते हैं। इस समय ये ग्रंथियाँ लाल रंग की हो जाती हैं।

कारण-

ऋतु या जलवायु परिवर्तन, सर्दी लगना, आतशक, वात ज्वर, खट्टे पदार्थ अधिक खाना, दूषित वायु, दूषित दूध पीना, गर्म पदार्थ लेने के तुरन्त बाद ठंडी चीजे खा लेना आदि।

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लक्षण-

टाँसिल सूजकर लाल हो जाता है, उन पर पीले या सफेद निशान प्रतीत होते हैं। यदि समय पर चिकित्सा नहीं की जाये तो यह टाँसिल ग्रंथि पक कर फट जाती है। पकने पर जब तक मवाद नहीं निकल जाये, तब तक या प्रदाहित अवस्था में ज्वर, सिरदर्द, साँस लेने में कष्ट, शरीर में दर्द, स्वरभंग, बेचैनी और सुस्ती होती है। रोगी निगलने में असमर्थ होता है।

रोग की पहचान-

तालूमूल ग्रंथि की सूजन, लाली एवं निगलने में कष्ट रोग के निर्णायक लक्षण हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा-

Gale Ke Tonsils Ke Liye Ayurvedic Upay

1. टाँसिल प्रदाह होने पर निगलने में बहुत कष्ट होता है, लेकिन यह भी इस रोग की विशेषता ही कहें कि भूख मारी जाती है। खाने की रूचि नहीं रहती है। फिर भी कुछ न कुछ आहार लेना आवश्यक है।

2. ठोस आहार बिल्कुल न दें। संतरे, नींबू आदि का रस, शहद और जल लगातार 3-4 दिन तक दें।

3. एनीमा प्रतिदिन करें, जिससे विवृत संचित मल प्रतिदिन आये।

4. आवश्यकतानुसार उपवास भी करें।

5. गुनगुने पानी से स्नान करना और गर्म तथा ठंडे पानी से(पर्यायक्रम से) कटि स्नान करना मल को बाहर निकालने में सहायता करता है।

6. गर्म पानी में नमक एवं नींबू निचोड़ कर गरारे करें।

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7. गीली मिट्टी की छाती पर और गले पर पट्टी करें। ये पट्टियाँ गले को विकारमुक्त करने में सहायक होती है। पट्टियाँ नित्य दो बार 2 से 4 घंटे तक लगायी जाएं।

8. गर्दन और पीठ की मालिश भी कष्ट को कम करती है। गर्दन की धीरे-धीरे दायें और बायें हिलाने से भी लाभ होता है।

9. रोग की उग्रता कम हो जाने पर रोगी को कुछ दिन तक केवल फल दें। कुछ और सुधार होने पर उबली हुई सब्जियाँ और सलाद आदि दें।

10. स्थित सामान्य हो जाने पर आहार परिवर्तन आवश्यक है। जिस आहार से रोग बढ़ रहा है, पुनः उसे मत दें।

11. आहार में फल, कच्ची और उबाली तरकारियाँ(सब्जियाँ), दूध, दही, गिरी और पुराना अन्न(चावल) हितकर है।

12. चाय, कहवे, सफेद चीनी, मैदे से बनी चीजों से परहेज रखें। आहार की इस व्यवस्था से रक्त की क्षारीय गुणों में वृद्धि होती है रोग से शीघ्र मुक्ति मिल जाती है। वृक्कों की कार्यक्षमता में सुधार होता है।

13. गहरे साँस लेने वाले व्यायाम करें जिससे शरीर के अंदर अधिक से अधिक आॅक्सीजन जा सके।

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घरेलू चिकित्सा-

1. कच्चे फालसों के क्वाथ(काढ़ा) से कुल्ले करने से लाभ होता है।

2. लीची के फूल, जड़ एवं छाल से बने काढ़े से कुल्ले करें, आशातीत लाभ होगा।

Gale Ke Tonsils Ke Liye Ayurvedic Upay

3. सिंघाड़े(पानी फल) कच्चे खाने से टाँसिल में लाभ होता है।

4. पालक के पत्तों को अच्छी प्रकार पीसकर काढ़ा बना लें। इस गुनगुने काढे़ से गरारे करने से लाभ होगा।

5. मूली का रस एक गिलास में थोड़ा नमक मिलाकर नित्य 2-3 बार गरारे करने से आशातीत लाभ होता है।

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